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जिन्देगी हर मोड़ पे चाहिए एसा एक हाथ जो गम को खुसि से बदल के अगला मक़सद से ना बिखड़ना सिखाऐ कर्तब्य को चुन के दिखाऐ एसे दोस्त जिन्दैगी माएने समझाते हे। खुसि में ज़िन्दगी को राहा से ना भटका दै उहि अक्सर बड़ी दोस्त है।

दोस्त राजा हो ईया भिखारी हो उ माएनै नेहि रखते हैं। बलकि दिखते हे उनका दिल कितना बड़ा है प्यार के आहट को कितने समझ के दिल में छुपाते है सायेद इस प्यार को अन्मोल सा प्यार का दोस्ती है।

कलियुग में बिश्ब ब्रह्मांड को दिखाने बाले भगबान स्वयं नारायण हो कर भी मन में घमण्ड ना आये गुर जी के शरणापन हो के भ्राता बलराम के साथ बालसखा सुदामा तिनो मिल् के गुरु सांन्दिपनी से सिखा प्राप्त किये संन्दिपानी आश्रम में। जो अबन्तिका नगर में है जो उज्जयिनी में अबस्थित है । उहाँ पे गरु शिस्य मित्रो को बहत प्यार के घकना घटाएं जो दिख के स्वयं गुर सांन्दिपनी आस्चर्जय हो गैयै थे।

चार दिन में चार बेद छे दिन में छे सास्त्र अठारा दिन में अठारा खन्ड पुराण बिस दिन में गिता ज्ञान चोसठि दिन चौंसठ पाठ सोला दिन में सोला कला प्राप्त किये थे। गुर दान दक्षिणा दे कर सारे उपनिषद् के ज्ञान प्राप्त किये थे जो ज्ञान उनके याद रेह जाता था शाला को कुम्भ कुन्डो में अन्य पटिका स्लेट नेहला देते थे अभि उसोको अंन्ग पादिका केहला जाति हे।

गुरु कुम्भित् नदि में हर रुज स्नान करने जाते थे बहत दुर तब भगवान स्री क्रिष्ण प्राण को कष्ट होने लगा उर गुरु केसे दूर ना जाए बाहार निकट में स्नान कर पाए आग्रह से पूछ के जो ज्ञान गुरु से प्राप्त किये उस ज्ञान में कर के दिखाएन्गै शुन के गुरु सांन्दिपनि हैरान हो गेयै ग्यार साल के बचा केसे इतने कम् उमर में कर पाएगा? उनको केसे पता होगा स्वयं नारायण जि के बाणी बोल रेहि है? अनमुति ले के कुम्भति नदि सारे पबित्र जल उस में भर दिये। असि जागा में सुदामा के साथ दोस्ति अतुट बाना हुआ था।

गरिब ब्राह्मण घर की सुदामा जी सखा कृष्ण प्रेम में नित्य खोद कोसमर्पित् करते थे। प्यार के आहट जब पुकारे उस में बक्त भि इन्तिहान लेता हे सन्तुष्ट होने के बाद चमचमकता प्यारे से तोफा बन् के जिबन की मूल समझाता हे। साएद दोस्ती प्यार भक्ति सब निगरानी में रख कै फुल बरस्ति हे उ बक्त।

द्वारिकाधीश कृष्ण अष्ट पाट रानी रेहेते हुए सखा सुदामा भिक्षा बृति करके जो सामग्री ले आते थे उस निवाले को खाने से पेहेले घेनु एक अतिथ परिवार को दे के साथ में खाते थे। उ सब में कृष्ण जी माया में जानते थे। इतना दर्द पा के भि किस् तरा क्रिष्ण प्रेम में मग्न रेहेते थे उ खुद हि हेरान हो जाते थे। भंन्गा कुटिर कुइ कभि निबाला केलिये भुका नेहि लटते थे। जिस दिन सुदामा जि केलिये निहि रेहता था उ पानी पिइ के उठ् जाते थे उस दिन कृष्ण भगवान जि उपवास रहते थे।तब पत्नी सब पोछ् के रो पड़ते थे।

एसे एक दिन आया सखा कृष्ण को देखने कि मन आकुल हुआ आंख भरके दिखोन्गा मेरे मित्र को पास में कुछ नेहि किया देन्गे भेट् स्वरुप तब पत्नी भजा हुआ चावल पुटलि में बान्ध दिये। पथ में जाने के बक्त पुराने बात याद आने लगा।

सुदामा ब्रह्म सहस्र ज्ञान में निपुन थे। जब बालसिखा प्राप्त करने गेये थे सांन्दिपनि आश्रम में तब एक बुढ़ि मा ने भिक्षा मान्ग के खाते थे। पांच दिन उपवास रेहनेके के बाद जो चना था उ रात में रख दिये शुभे भगवान को भोग लगा के खाउन्गी, परन्तु उस रात उनके घर में चोर घुसा ढुन्डने लगे कुछ ना मिला दिख के एक पुटलि पे नजर पड़ा उठालिये चने का पुटलि को सुना चान्दि समझ के ले गैया तब बूढ़ी मा ने शाप दिये थे जो खाएगा भिखारी होगा । जब दिखा उ तुरन्त गांउ के भय में आश्रम के पास छोड़ के चला गेया।

उसको जब गुरु माता ने पाये। क्रिष्ण उर सुदामा बन में जाने लगे तब गुरु माता ने बोले दे दिया चने साथ में खालेना उस शाप सुदामा जान के मेरा दोस्त भिखारी ना बने उ खुद हि खाए थे। तब से गरिब हुए थे।

पिछले बात याद करकरके जा के पहन्चे द्वारिका में। पेर में काण्टो चुकने से खुन बेहता था तब भि नेहि थके थे। उ सब कृष्ण ने देख के खुद के हातो मैं साफ करके पाट् पिताम्बरि पेहना के मेरेलिये भाबि ने किया भेजे पूछ के उ भाजा हुआ चावल दो बार खाए स्वर्ग मर्त्य दान दिये।

एसे प्यार देख के उरो पत्नी सब भाजा हुआ चावल लेगेयै आप के सब हक् किया हम नेहि खाएऐन्गे किया? उर जब सुदामा घर पे लटे तब देखे कुटिर् प्रासाद में बन चुकि हे। देश में राजा के शासन प्रजा ने ब्यथित् हो गये थे खाने से लेकर रहने तक सब चमचमाति हे। उ सब केसे हुआ पूछने से सुदामा कृष्ण भेजे थे बिस्वकर्मा को उ जब काम करने लगे तब पत्नी बसुन्धरा खुद कि अमिर होने कि किया सक् हे? जब पाश में सब गरीब रहे! ऊ बात शुन के बिश्वकर्मा नगर मैं सबके प्रासाद बना दिये।

सबके मुंह में सखा उर पत्नी के गुण गान दैख के दिल भर गेया। संसार में त्याग के फल जरुर लटता हे। उर प्रेम जिबन को अनमोल बनाती हे।छल प्रेम सांस छिनलेति हे। उ हे दोस्ति के नाम में त्याग प्रेम भर भर के मेहकता हे।

शान्ति लता परिड़ा

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