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पृथ्वी पर जब आदमि औरत पेदा हुए तब भगवान उनके कर्म करने के लिये बहत सारे काम ढ़ुन्ड के रखे। उस नित् नियम मानले बाले सकुन के जिन्देगी कदम में पाके जिते हे। उर जो अनदेखा करते हे दरर्दनाक ठोकर खाआ के जिन्देगी नर्क बनाता हे।

कहावत हे
बचपन में जो बालाश्रम पुरि नेहि करते? श्येशब में जो ज्ञान प्राप्त नेहि किये? यौवन मो इन्द्रिय संजम नेहि किये? कर्मठ नेहि बने बुढ़ा पे उसको सकुन केसे मिलेगा? बक्त रेहेन से जो सहनशील हो जाते दुनिया में ऐसे कुई शक्ति नेहि जो मिटाके आगे चला जाएगी।

कान्टो के तकलीफ् सेहने से फुल कि खुस्वो जिन्देगी बन जाता है साऐद उसको जिन्देगी केहलाते है। कर्म प्रभावित मानब केहला जाति हे। नेहि पुरा करने से निकमा सूचित करते हे।

पत्राजपुर गाँउ में हरीश सर्मा नाम एक आदमी उर उनके औरत हेमलता शर्मा थे। एक बेटा सुदामा एक बेटी स्वाति थी।दोन को बचपन के सारे सकुन कि खुसिया दे के बड़ा किये फरबरिस् में कुई कमिया ना रखे!बडा़ जब हुए बाहार देश में पढ़ाई खत्म करके आई। तब हरीश शर्मा सोचे बेटि बड़ी हो चूका है अभी शादि करादेन्गे शशुराल जाने के बाद घर सम1भालना सिख के हमारा नाम रोशन करेगी।

बेटी जब जन्म लेती हे उ माता पिता के हात थाम के नाम रौशन करके दो कुल की मान मर्यादा रख के आखिर सांस तक सेबा करती हे शायद उसको बेटी केहते हे। माता पिता शशुराल भेजने के बाद बेटा सुदामा को शादी करा के सारे घर कि दाईत्व दे के तीर्थ में चला जाएन्गे ।पर बेटा कि ऐयाशी घमण्ड सोच के बजाये खुद को दोषी ठेरते हुए कोसते रहे। बल्कि हमारी कनशी फरबरशि में कमि रेह गेई?

बाप् कि दौलत बैठ के खाऊन्गी मन में जो चाहे ऊहि करुन्गी उ सोच का कर्तु माता हेमलता पिता हरीश अन्दर ही अन्दर घुटते रहे! बेटा कब शोचेगा
“बेठके खाने से दरिया की रेत भी एक दिन खत्म हो जाते” बक्त रहने से ना सोचने में!

बाहार देश में पाठ पढ़ा के इतना उमिद सब बिखड़ गेया। अहंकारी मानब बर्तमान को ले कर करने से भबिश्यत ना शोचके! आनेवाले दिन में आँसू साथ छोड़ता नेहि। माता पिता दिख दिख् के तन्ग आगेये। ऐसे निकमा नालायक बैटा पैदा होने से आछा हे बान्झ रेहना।

माता हेमलता तीर्थ किया जाएन्गे प्राण त्याग होगेया। बेहन श्बाति भैया के काम देख के इस घर में किसी खुसि की चिराग आएगा जहाँ पे अरद को सम्मान नेही होती, संस्कार नहीं, रुपिया के बल पर आदमी को जानवार सोचना,उहाँ पे सकुन की समा बुज जाएगी। बेहन की बात ना सोन के तिरस्कार कर के शशुराल भेज दिए।पिता हरीश शर्मा गाँउ से बेटे के बारे में शुन कर बेटा से तिरस्कृत हो कर बेटी के पास ना जा के बृद्धाश्रम चलागेये।

उ जमिन जायदाद किस काम की जाहाँ पे बेटा आग बनके राग करता है निकमा बन के नाम कि धुजिया उड़ाता हे। उ जिन्देगी पुत्र नाम की कलंक नर्क में धकल देता हे।

बैटी को जब पता चला पिता जी घर छोड़ के बृद्धाश्रम रहने लगे उ तुरन्त पिता जी को लेने चले। परन्तु बाप् जब बेटी बिदा कर देते है उसकी शशुराल में कैसे बोझ बनेन्गे?बेटी पहन्चने पेहले पिता उहाँ पे चल बसे!एसे हादसा देख के पेएर पे मिटि फिसलने लगा। बेटा प्येदा कर के कन सा सुख मिला? जब मैने खुद लेने आई बाप की मरा मुंह दिखा!पिता की लाश ले आके खुद ही संस्कार किया सारे क्रिया कर्म कर के बेटी के फर्ज निभाई।

तब सुदामा पर तोफान बेहने लगा। रुपिया सार के जब जमीन पे नजर पड़ा तब वकील ने घर से बाहार जाने की पत्र भेज दिये। कारण पुछने से बताये जिस बृद्धाश्रम में कुछ दिन केलिये रुके उस आस्रम के नाम में जाने से पहले वसीयत बनाके गये। पर कियु पुछा सुदामा? तब वकील ने बोले जो घर मान मर्यादा रखने में काबिलियत नेहि। मा बाप जिन्दा रहते हुए मत कि निद में सुला दिया उस निकमा को मा बाप कि अर्जित धन दौलत में कैसे अधिकार आएगा? बहत अएस आराम करलिये अब बाहार दुनिया देखिये।

धर छोड़ के बेहन के पास गैया पर बेहन श्बाति नेहि रखी जेसे बर्ताव किया था शशुराल बाले रोके। घर घर कि ठुकर मिला। दर्दनाक दिन देखने पड़ा। प्यार पाना दुर कि बात भुका प्यासा रहने लगा। ज्ञान को सेही उमर में काम में ना लगाने से उ कैसे महत्व होगा?इनशानियत बुरे बक्त में साथ निभाने आता उ ना सम्भालनेसे कुछ पल केलिये एसो आराम जिन्देगी नर्क बना देती है। उ जब सुदामा सुचा तब हाथ से बक्त निकल चुका है। सिर्फ आँसू बेहने लगा उर खुद को कोस राहा था में निकमा में निकमा । मेरे जेसे उलाद को कन सा सुख मिलेगा?

बक्त किसिको इन्तजार नेहि करता पर बक्त को सब इन्तजार करते। खाली हात में आए जाने के बक्त कर्म का फल स्मरणीय करता हे। उर नाम देता हे कर्म से काम चुन कर।उसलिये केहते हे “जेसे करणी ऐसे भरणी ”

शान्ति लता परिड़ा

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